behavior="scroll" height="30">हिन्दी-हरियाणवी हास्व्यंग्य कवि सम्मेलन संयोजक एवं हिन्दी-हरियाणवी हास्व्यंग्य कवि योगेन्द्र मौदगिल का हरियाणवी धमाल, हरियाणवी कविताएं, हास्य व्यंग्य को समर्पित प्रयास ( संपर्कः o9466202099 / 09896202929 )

सोमवार, 25 अगस्त 2008

गजल

छूटग्या इब देस राणी.
चल चलैं परदेस राणी.

क्यूं बिमारी नै बुलावै,
छोड़ आल्ला खेस राणी.

हम जमूरे-वो मदारी,
सै गजब परमेस राणी.

एक तोत्ता-एक पिंजरा,
और सौ-सौ देस राणी.

अपणों का मारा गुजरग्या,
सह ना पाया ठेस राणी.

चोर था नाम्मी-गराम्मी,
रक्खे सौ-सौ भेस राणी.

फीस म्हं थोड़ी कसर थी,
फिर बिगड़ग्या केस राणी.

बात सबकी मान 'मुदगिल',
हो गया दरवेस राणी.
--योगेन्द्र मौदगिल

4 टिप्‍पणियां:

  1. गजब की मार है आपकी कविता में !

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  2. फीस म्हं थोड़ी कसर थी,
    फिर बिगड़ग्या केस राणी.


    बेहतरीन व् लाजवाब ! बधाई !

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  3. छूटग्या इब देस राणी.
    चल चलैं परदेस राणी.
    योगेन्दर जी बहुत ही सुन्दर भाव
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. फीस म्हं थोड़ी कसर थी,
    फिर बिगड़ग्या केस राणी.

    बात सबकी मान 'मुदगिल',
    हो गया दरवेस राणी.


    योगेन्द्र जी बहुत अच्छी रचना है !!!!!!!

    उत्तर देंहटाएं

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