behavior="scroll" height="30">हिन्दी-हरियाणवी हास्व्यंग्य कवि सम्मेलन संयोजक एवं हिन्दी-हरियाणवी हास्व्यंग्य कवि योगेन्द्र मौदगिल का हरियाणवी धमाल, हरियाणवी कविताएं, हास्य व्यंग्य को समर्पित प्रयास ( संपर्कः o9466202099 / 09896202929 )

मंगलवार, 13 मई 2008

गजल

के माणस की जात नै होया
घर के बारणे किक्कर बोया

सालगराम नै रोज नुहावै
पर पंडत नै दिल्ल ना धोया

बुरे काम का बुरा नतिज्जा
इब क्यूं माथ पकड़ कै रोया

उसी बखत आए थे चोर
जिब तू लांबी ताण कै सोया

गधा गधाई रह्वै सै प्यारे
गधे नै इब्लग बोज्झाई ढोया

उसपै दुनिया हंसी मौदगिल
नसे म्हं जिन्नै सबकुछ खोया
--योगेन्द्र मौदगिल

1 टिप्पणी:

  1. आपके व्यंग सटीक हैं, हरयाणवी पढने में कठिनाई होने के बावजूद जब तक पूरा नही पढ़ लिया, आपको छोड़ने का मन नही हुआ ! लिखते रहें !

    उत्तर देंहटाएं

आप टिप्पणी अवश्य करें क्योंकि आपकी टिप्पणियां ही मेरी ऊर्जा हैं बहरहाल स्वागत और आभार भी