behavior="scroll" height="30">हिन्दी-हरियाणवी हास्व्यंग्य कवि सम्मेलन संयोजक एवं हिन्दी-हरियाणवी हास्व्यंग्य कवि योगेन्द्र मौदगिल का हरियाणवी धमाल, हरियाणवी कविताएं, हास्य व्यंग्य को समर्पित प्रयास ( संपर्कः o9466202099 / 09896202929 )

शनिवार, 3 मई 2008

योगेन्द्र मौदगिल की गजल

ईब कड़ै का धरम करम सै
यू तो न्यूए लोक भरम सै

न्यूई तो वो खाग्या मार
दिल का बैरी घणा नरम सै

जद उसनै कोई सरम नहीं तो
तन्नै उसकी किसी सरम सै

मन्दर म्हं चौंप्पड़ बाज्जै सै
मूंह म्हं राम हाथ म्हं रम सै

ईब थाप कविता की रोट्टी
तवा कलम का घणा गरम सै

आंख खोल कै देख जरा
अर्जन का भाई अक्रम सै

बाहर तै करड़ा सै मौदगिल
पर भीत्तर तै घणा नरम सै

3 टिप्‍पणियां:

  1. बाहर तै करड़ा सै मौदगिल
    पर भीत्तर तै घणा नरम सै
    तो भाई जी आप की नरमी का फ़ायदा उठा कर आप के ब्लाग का लिन्क हम अपने ब्लांग http://sikayaat.blogspot.com/ पर देरहे हे,आप को कोई ऎतराज होगा तो हटा देगे.

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  2. राज जी, बिल्कुल सही लेकिन एक बात बताऊं कि जिनका आत्मविश्वास समाप्त हो जाता है. वे बेचारे बेनामी ना रहें और क्या रहें. रही बात दूसरी कि जब हरियाणा एक्सप्रैस को आपने सुख दुख का साथी ही मान लिया तो फिर अपने को काहे की आपत्ति. हम तो यारों के यार हैं.

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  3. बहुत अच्छे मौदगिल साहब ये पंक्तियाँ तो कमाल की हैं

    ईब थाप कविता की रोट्टी
    तवा कलम का घणा गरम सै

    आंख खोल कै देख जरा
    अर्जन का भाई अक्रम सै

    बधाई स्वीकारें|

    उत्तर देंहटाएं

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